Tuesday, October 26, 2021

महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में पहली बार हुआ ये, क्या दिखेगा असर?

हात्मा गांधी काशी विद्यापीठ इन दिनों एक नए दौर से गुजर रहा है। जहां बदलाव और समस्याओं में संघर्ष छिड़ा हुआ है। ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब प्रो. आनंद कुमार त्यागी ने कुलपति का पद संभाला था। नए कुलपति के आने के बाद विश्वविद्यालय में कई बदलाव किए गए। प्रशासनिक स्तर पर परिवर्तन देखने को मिला है। लेकिन इन बदलावों का असर महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के खस्ताहाल पर कितना पड़ता है ये आने वाले वक्त में मालूम होगा। फिलहाल विश्वविद्यालय की ओर से एक नई शुरूआत की गई है। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में अनुसूचित जाति/ जनजाति विशेष प्रकोष्ठ का गठन किया गया है।

कुलपति प्रो. आनंद कुमार त्यागी के आदेश से विश्वविद्यालय परिसर में अनुसूचित जाति/ जनजाति विशेष प्रकोष्ठ का गठन किया गया है। समाजशास्त्र विभाग की प्रो. रेखा इस प्रकोष्ठ की संयोजक है। विश्वविद्यालय के अनुसूचित जाति/ जनजाति विशेष प्रकोष्ठ में प्रो. भावना वर्मा, डॉ. नीरज कुमार सोनकर, दीपक कुमार, प्रमोद कुमार और अंजनी कुमार शामिल हैं।

प्रो. रेखा से बातचीत:

महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ की स्थापना के सौ वर्षों बाद अनुसूचित जाति/ जनजाति विशेष प्रकोष्ठ का गठन किया गया है। देखने वाली बात होगी कि प्रकोष्ठ किस तरह कार्य करती है? क्या विश्वविद्यालय में इस प्रकोष्ठ के गठन के बाद क्या बदलाव देखने को मिलेंगे? बड़ा सवाल है कि क्या प्रकोष्ठ की सिफारिशों पर विश्वविद्यालय प्रशासन कार्रवाई करेगा? ऐसे ही सवालों पर खबर तक मीडिया ने प्रकोष्ठ की संयोजक प्रो. रेखा से बातचीत की।

प्रो. रेखा (फाइल फोटो)

प्रो. रेखा ने बताया कि “विश्वविद्यालय के अनुसूचित जाति/ जनजाति के छात्र-छात्राओं के लिए यह प्रकोष्ठ बनाया गया है। अनुसूचित जाति/ जनजाति के छात्र-छात्राओं के प्रवेश से लेकर छात्रवृत्ति तक जो भी समसस्याएं आएंगी उन्हें लेकर प्रकोष्ठ अपनी सिफारिश करेगा। उस पर कदम उठाने का अधिकार तो प्रशासन को ही है। प्रकोष्ठ का फायदा भी तभी होगा जब कार्रवाई होगी। अन्यथा इस तरह की समितियां तो बनती ही रहती हैं।” उन्होंने आगे कहा कि “अक्सर इस वर्ग के छात्र-छात्राओं के छात्रवत्ति के फार्म रोक दिए जाते हैं या जमा करने में परेशान किया जाता है। इस तरह की समस्याओं प्रकोष्ठ का पूरा ध्यान रहेगा।”

जातिगत भेदभाव को लेकर प्रो. रेखा ने कहा कि “कक्षाओं में भी जाति को लेकर गाहे-बगाहे भेदभाव सुनने को मिलता है। कई शिक्षक बच्चों से जोर देकर पूरा नाम पूछते हैं। ऐसे शिक्षकों को अपनी मानसिकता बदलनी चाहिए। विश्वविद्यालय में अगर किसी अनुसूचित जाति/ जनजाति के विद्यार्थी के साथ जाति को लेकर गलत व्यवहार किया जाता है तो प्रकोष्ठ इसे लेकर अपनी रिकमेंडेशन प्रशासन को भेजेगी। कार्रवाई करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।”

उन्होंने बताया कि “अनुसूचित जाति/ जनजाति का कोई भी विद्यार्थी ऐसी समस्याओं को लेकर प्रकोष्ठ से लिखित शिकायत कर सकता है।” बातचीत के खत्म होने से ठीक पहले प्रो. रेखा कहती हैं कि “यह प्रकोष्ठ सिर्फ छात्र-छात्राओं के लिए ही है। लेकिन इस तरह की व्यवस्था शिक्षकों के लिए भी होनी चाहिए। न सिर्फ एससी/एसटी बल्कि ओबीसी के शिक्षकों के लिए भी प्रकोष्ठ बनाई जानी चाहिए। क्योंकि एससी/एसटी और ओबीसी के शिक्षकों का भी उत्पीड़न (Harassment) होता है।”

अब देखने वाली बात होगी प्रकोष्ठ अपना किस सक्रियता के साथ करता है? क्या प्रकोष्ठ की सिफारिशों पर कदम उठाए जाएंगे? या फिर यह प्रकोष्ठ सिर्फ कागजों पर ही रह जाएगा? या प्रो. रेखा का वह संकेत सही साबित होगा कि “कमिटियां तो बनती ही रहती हैं।”

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