सत्तर साल से पढ़ा रहे 102 वर्ष के नंदा प्रस्टी को मिला पद्म श्री, पढ़िए प्रेरणा की कहानी

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राष्ट्रपति भवन में नंदा प्रस्टी को पद्म श्री पुरस्कार से नवाजा गया। (फोटो साभार: ट्विटर)
राष्ट्रपति भवन में नंदा प्रस्टी को पद्म श्री पुरस्कार से नवाजा गया। (फोटो साभार: ट्विटर)

मंगलवार यानी 10 नवंबर को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में नंदा प्रस्टी को पद्म श्री पुरस्कार से नवाजा गया। पद्म पुरस्कार प्राप्त करने नंदा प्रस्टी की उम्र 102 साल है। नंदा प्रस्टी बीते सत्तर सालों से शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं। आज राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पद्म पुरस्कार प्रदान किया।

नंदा प्रस्टी उड़ीसा के रहने वाले हैं। उनके गांव के लोग उन्हें नंदा मास्टर कहते हैं। नंदा मास्टर अपने गांव में एक पेड़ के नीचे बच्चों को पढ़ाते हैं। नंदा प्रस्टी अपने गांव के बड़े उम्र के लोगों को भी पढ़ाते हैं और उन्हें शिक्षित करते हैं। नंदा प्रस्टी के स्कूल में सुबह नौ बजे बच्चे पढ़ने आते हैं। शाम को चार बजे से छह बजे तक भी कक्षाएं चलती हैं। बड़े उम्र के लोगों को शाम छह बजे के बाद पढ़ाते हैं नंदा मास्टर।

बीते सत्तर सालों से नंदा प्रस्टी ये काम कर रहे हैं। नंदा प्रस्टी महज कक्षा सात तक पढ़े हैं। कक्षा सात के बाद उन्हें अपनी पढ़ाई बंद करनी पड़ी थी। क्योंकि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर था। नंदा प्रस्टी के पास डिग्री भले न हो लेकिन ज्ञान का भंडार भरा हुआ है।

नंदा प्रस्टी के पिता चाहते थे कि वो खेती के काम में उनका सहयोग करें। लेकिन अपनी पढ़ाई छूट जाने के बाद नंदा प्रस्टी ने तय किया कि वो अपने गांव में किसी भी व्यक्ति को अशिक्षित नहीं रहने देंगे। सत्तर साल पहले उन्होंने अपने गांव के लोगों को शिक्षित करने का लक्ष्य तय किया था। बताया जाता है कि नंदा मास्टर अब तक गांव की तीन पीढ़ियों को पढ़ा चुके हैं।

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गत जनवरी के महीने में भारत सरकार की ओर से पद्म श्री पुरस्कार विजेताओं के नाम घोषणा की गई थी। उसमें नंदा प्रस्टी का नाम भी शामिल था। पद्म श्री मिलने पर नंदा प्रस्टी ने कहा था कि “पद्म श्री पुरस्कार के लिए चुने जाने पर मुझे बेहद खुशी है। मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं थी लेकिन देशी भाषा के कुछ अखबारों के रिपोर्टरों ने ही यह जानकारी दी। मैंने कभी सोचा नहीं था कि यह सम्मान मुझे मिलेगा।”

नंदा प्रस्टी की कहानी देश भर के लिए प्रेरणास्त्रोत है। उन्होंने बगैर किसी स्वार्थ के सात दशकों से गांव के लोगों को शिक्षा दी है। समाज को शिक्षित करने के लक्ष्य से उन्होंने काम किया।

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