क्या चीन ने अरुणाचल प्रदेश में भारत की जमीन पर गांव बसा दिया है?

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चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत (फोटो साभार: पीटीआई)
चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत (फोटो साभार: पीटीआई)

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद सुलझने के बजाए उलझते ही जा रहा है। चीनी सेना की आक्रामकता भारत के लिए भारी खतरा बन चुकी है। इस बात को खुद चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत ने भी स्वीकार किया है। जनरल बिपिन रावत ने माना है कि भारत की सुरक्षा के लिए अब चीन सबसे बड़ा खतरा है। जनरल रावत ने चीन द्वारा अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी इलाकों में गांव बसाने की रिपोर्ट का खंडन किया है।

जनरल बिपिन रावत ने कहा है कि चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास निर्माण तो कर रहा है लेकिन वो अपने हिस्से में। जनरल रावत की मानें तो चीन एलएसी के भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार अपने ही क्षेत्र में निर्माण कार्य कर रहा है। लेकिन भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपनी एक साप्ताहिक प्रेस वार्ता में कहा था कि भारत ने ‘अपने क्षेत्रों पर चीन के अवैध कब्जे’ को कभी स्वीकार नहीं किया है।

सीडीएस जनरल बिपिन रावत बीते दिनों एक टीवी न्यूज चैनल के कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे थे। बातचीत के दौरान उनसे चीन और भारत के बीच चल रहे सीमा विवाद पर सवाल पूछा गया। जनरल बिपिन रावत से अमेरिकी सुरक्षा विभाग की एक रिपोर्ट के हवाले से सवाल किया गया था। जिसमें दावा किया गया है कि चीन ने तीब्बत और भारत के अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी इलाके के बीच भारतीय जमीन पर एक गांव बसाया है।

जवाब देते हुए जनरल बिपिन रावत ने कहा कि “चीन एलएसी के अपने हिस्से में ही कुछ निर्माण कर रहा है। उन्होंने एलएसी को लेकर हमारी स्थिति का उल्लंघन नहीं किया है। दोनों देश एलएसी को लेकर अपनी-अपनी दृष्टिकोण रखते हैं। हम एलएसी के बारे अपनी स्थिति को लेकर एकदम स्पष्ट हैं।” उन्होंने आगे कहा कि “जहां तक हमारा संबंध है एलएसी के हमारे हिस्से में ऐसे किसी गांव (जैसा रिपोर्ट में दावा किया गया है।) का विकास नहीं हुआ है।”

गौरतलब है कि अमेरिका के सुरक्षा विभाग पेंटागन की एक रिपोर्ट ने इस चर्चा को बल दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन ने भारत की जमीन पर एक नया गांव बसा दिया है। इसे सौ घरों वाला एक गांव बताया गया है। जो कि तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र और भारत के अरुणाचल प्रदेश राज्य के बीच मौजूद है।

पेंटागन की इस रिपोर्ट पर भारत में बहस शुरू हो गई है। विपक्ष ने भारत सरकार से इस बाबत सवाल किए हैं। केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कई सवाल उठे। लगे हाथों प्रधानमंत्री मोदी के पुराने बयान पर फिर उनकी आलोचना होने लगी। जिसमें प्रधानमंत्री ने चीन को लेकर कहा था कि “भारत की सीमा में ना कोई है और ना कोई आया था।” इस मुद्दे पर अब तक प्रधानमंत्री ने चीन को लेकर कोई बयान नहीं दिया है। जैसा कि अक्सर प्रधानमंत्री मोदी पाकिस्तान के मामले में किया करते हैं।

पाकिस्तान के साथ सीमा विवाद या फिर आतंक के मसले पर प्रधानमंत्री मोदी अमूमन अपनी जनसभाओं और भाषणों में दहाड़ते रहते हैं। लेकिन चीन के मसले पर अब तक उन्होंने ऐसा तेवर नहीं दिखाया है। ना ही कभी चीन का नाम लेकर कोई बयान ही दिया है।

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने एक साप्ताहिक प्रेस वार्ता में कहा था कि पिछले कई वर्षों में सीमावर्ती क्षेत्रों के साथ-साथ उन क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियां शुरू की हैं जिन पर उसने दशकों से अवैध रूप से कब्जा कर रखा है। भारत ने कभी न तो हमारे क्षेत्र पर इस तरह के अवैध कब्जे को स्वीकार किया है न ही चीन के अनुचित दावों को स्वीकार ही किया है।

चीन के साथ सीमा विवाद में भारत की स्थिति अब तक पूरी तरह साफ नहीं है। जनरल बिपिन रावत का कहना है कि चीन ने कुछ निर्माण किया तो है लेकिन एलएसी के अपने हिस्से में ना कि भारत के हिस्से में। तो वहीं विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का बयान है कि चीन ने भारत के जमीन पर किए गए अवैध कब्जा वाले इलाके में निर्माण कार्य किया है। जिसे भारत कभी स्वीकार नहीं करता है।

राजनीतिक रूप से भारत की केंद्र सरकार इस मसले पर अब तक तथ्य लेकर सामने नहीं आई है। “भारत अपनी सीमा की सुरक्षा के लिए तैयार है। भारत की अखंडता की ओर आंख उठाने वाले को भारत करारा जवाब देगा” जैसे भावनात्मक बयान तो केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार खूब देती है। लेकिन सीमा की सच्चाई क्या है इस पर कोई तथ्यपरक जानकारी अब तक नहीं दी गई है।

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